ककल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 3168

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हम सब के लिए कभी नहीं लिखते।

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हम सब के लिए कभी नहीं लिखते। हम बस उस एक तक पहुंचने के लिए लिखते हैं। कभी कभी सब में एक होता है कभी एक में सब लिखना मन को मनाने और मान कर मन का कहा मन जाने की आसान विधि है। आप सो सकते हैं एक पूरी नींद अगर कह पाते हो तो .... आप हँस लेते हो खुद को समझा कर। पन्ने खत्म नहीं होते प्रेम में। शब्दों के बाद चुप्पियाँ भी अपनी लिपि लिए इंतजार में खड़ी रहती हैं।😊😊😊 जानते हो ....मैं रोज़ हँस कर एक नींद सो जाती हूँ। *तस्वीर की पंक्तियाँ अंग्रेजी में पढ़ी कहीं... अपने मन की लिख दी इससे सुंदर कुछ नहीं पढ़ा आज
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें