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तन से ढंके हुए मन को नहीं मन से ढंके हुए तन को प्रेम पहनता है।

तन से ढंके हुए मन को नहीं मन से ढंके हुए तन को प्रेम पहनता है। अपने पास से लौट कर आओ तो तुम्हारी खनक साथ चली आती है। तुमको साये में जगह दी है। बने रहें😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें