कल्पनाशब्दों के बीच
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बेहिसाब बेचैनियां हैं

बेहिसाब बेचैनियां हैं .... बस इस लिए कह सकती हूँ कि तुम भी बेशुमार हो मेरे पास। तुम्हारे नाम के वो मंज़र याद रहते हैं जो लफ्ज़ इश्क में खर्चे आबाद रहते हैं
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें