कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 3139

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ऐसा बहुत कम होता है कि किसी का absentia आपके साथ चलता है।

ऐसा बहुत कम होता है कि किसी का absentia आपके साथ चलता है। कोई नहीं होता आसपास पर लगता है तुम बैठे हो ।देख भी नहीं रहे होते ।अपने रोज़ाना में मशगूल ।कोसों दूर.... पर छूने भर तय दूरी के साथ । दिन उगने के साथ मन में उग आते हो ।दिन भर मेरे मन को थाप देते हो। ज़ाहिर भी नहीं होते। न चेहरे से, न हँसी से,न उदासी से। बस होते हो।आभास होता है मुझे कि किसी किसी रोज़ तुम उस पल से भी बाहर निकल कर ठीक मेरे सामने बैठ जाते हो ।मैं तुम्हें साफ साफ देख पाती हूँ ।तुम मेरी मुस्कुराती आंखों में ही खत्म हो जाते हो। एक पल का संगम संगमर्मर हो जाता है। ये ओझल नहीं समा जाने जैसा है इस अनुभूति को क़ैद नहीं किया जा सकता।लिखा भी नहीं जा सकता पर देखा जा सकता है। *है* और *हाँ है* के बीच *नहीं* हो तुम मेरे। अणुपस्थिति कोई शब्द नहीं ... पर तुम्हारे लिए ईजाद किया है। *स्कूल जा रही ।बारापुला पर हद जाम है। उंगलियां संगीत के साथ बज रहीं ... किसी मेहरबाँ ने आकर ज़िन्दगी सज़ा दी।😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें