भाषा / Language
बस बहते ही रहने वाले चश्मे भी एक रूप में बंजर ही हैं
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बस बहते ही रहने वाले चश्मे भी एक रूप में बंजर ही हैं
व्यर्थता सागर की भी उतनी ही है जितनी एक सूखे की कगार पर खड़े कुँए की।
बस इतना है तुमसे कहना
बाक़ी रहना जरूरी है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें