भाषा / Language
मन रखने के लिए नहीं लिखती
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मन रखने के लिए नहीं लिखती ...
कहने का मन रखती हूँ
बस इसलिए लिखती हूँ।
बहुत दिनों से उदासी नहीं लिखी....
एक बार फिर मुकर जाओ ना ।
*ये सब पुराना लिखा है।
बहुत दिन हो गए कुछ लिखा नहीं गया।न मन रहा।
एक अजीब बैचेनी और उथलपुथल है। जैसे धागे टूट रहे हों।
जाने क्या बात है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें