कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 3104

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मैं

मैं ........ माटी के पैमाने सी मैं ...... क्यों छुआ ? चटक गयी न मैं लो ......अब रिस रहा है नेह भर-भर यही चाहते थे न तुम ....स्नेह खुद पर अंजुरी में भर लो या अंतस में धर लो आधी भरी हुई आधी खाली सी मैं माटी के पैमाने सी मैं छुआ था ना ..... इस लिए चटकी थी मैं करीब आओ देखो तो सही इक दरार ही नहीं हैं खरोंचे भी कई आधी रंगी रंगी कहीं बद रंग भी मैं फिर तुझे क्यूँ भाती हूँ मैं चेहरे में चमक लाती हूँ मैं शायद तेरी ही माटी की मैं शायद तेरे ही पैमाने की मैं चूम लो .... तेरे लिए ही चटकी हूँ मैं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें