कल्पनाशब्दों के बीच
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जब तुमसे नाराज़ होती हूँ तो अपने और तुम्हारे बीच ढ़ेर सारा ईश…

जब तुमसे नाराज़ होती हूँ तो अपने और तुम्हारे बीच ढ़ेर सारा ईश्वर रख देती हूँ। चुप्पी क्या नहीं तोड़ देती। ईश्वर पिघलता रहता है मैं एक बार फ़िर तुम्हारे करीब आ जाती हूँ । तुम कुछ कहते नहीं .... मैं भी बस मुस्कुरा देती हूँ। सच है....मेरे जैसे हज़ार होंगे। पर सारे थोड़े ही तेरे बीमार होंगे। शुभ रात💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें