भाषा / Language
पता नहीं
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पता नहीं.....
इतने सालों में मुझे हमेशा से ये महसूस हुआ कि मैं एक खाली खनकता हुआ कलश हूँ।
कुछ भरना चाहती हूं खुद में ..
ऐसा कुछ नहीं जिस की कमी हो या जो पाया न हो फिर भी तलाश थी भरे जाने की ..क्या कैसे पता नहीं ।
एक रोज़ दो लोग मिले। शायद ईश्वर ने उस दिन सिर्फ़ हम दोनों के लिए ही वक़्त निकाला हो।
अनजान अजनबी .....
इन दोनों को यही नाम से पुकारा जाए तो खूबसूरत बने रहेंगे।
अजनबी मैं हूँ।
अनजान ज़ाहिर है तुम हो।
तुमसे मिली तो लगा कलश अपने आप भर रहा.... किससे कैसे पता नहीं।
तुमने मुझे कम देखा, कम कहा,ना भर मुझे सुना पर मैं कंठ तक भर गई...कैसे क्यों पता नहीं ।
मैं भरी भरी रहने लगी ।छलकने लगी । सोचा कह दूं तुमसे कि ये क्या हुआ है मुझे जो नदी लौट रही मुझमें ? कहा भी शायद.... पर तुम अनजान बने रहे....क्यों कैसे पता नहीं ।
फिर जो ये नदी लौटी मुझमें तो कलश भारी हो गया....एक रोज़ बेकाबू हो गया। लुढ़कर तुम तक पहुंच गया।
अनजाने तुम..... तुमने सुना और बिना कुछ कहे कलश उलट कर खाली कर दिया। मुझे लुढ़काकर वापस कर दिया... क्यूं किस लिए पता नहीं।
अजनबी मैं फ़िर एक बार अधभरी अधखाली अपने कलश को निहारते हुए तुम्हारी स्मृति में घुल गई। फिर ऊपर तक भर गई....कैसे क्यों पता नहीं ।
बरसों से इस तरह कई बार लौटाने और फिर फिर भर जाने की रस्म चली जा रही । अक्सर उदासी और थकान से भर जाती हूँ। तुमको भी वैसा ही पाती हूँ .... क्यों किस लिए पता नहीं।
इस लुढ़कने और भर जाने की यात्रा में क्या नहीं सीख लिया अजनबी ने अनजाने से....
*इंतज़ार सुख है ।
*प्रेम सरीखे दुःख सुंदर हैं। इन्हें बस देखो। चुनना मना है।
*ख़ाली और भरा रहना भरम है।
इस भरम में हँसना प्रेम है।
*प्रेम उदासी और इंतज़ार की रस्सी पर ही करतब दिखाता अच्छा लगता है। और मैं और तुम उस रस्सी के दो छोर पर एक दूसरे को देखते।
*प्रेम कहना जरूरी नहीं....पर निभाना हद जरूरी।
* न माँगों... न देने की जरूरत महसूस हो।
*जो है वो बस है।
उसका दिखना ...लिखना या कहीं दर्ज़ हो जाना जरूरी नहीं ।
*है एक आईना जिसमें अनजान और अजनबी की ही तस्वीर उभरेगी....तुम ये जानती हो और मुझे पता है।
उसकी ऐसी ही बातों से भरा मेरा कलश अब तैरता है.....मगन
मैंने लुढ़कना छोड़ दिया ।
उसने लौटाना।
मैं हूँ भी कि नहीं मुझमें .....
पता नहीं
उसमें भर गई हूँ। पता है।
अनजाने अजनबी न रहे।
😊 कैसे
किसलिए
क्यूँ
कब तक
पता नहीं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें