भाषा / Language
ऐसे बीतना कितना सुंदर है
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ऐसे बीतना कितना सुंदर है...
सब अपने अपने घरों में बेहद खुश हैं पर याद शहर का नाम अदल बदल रखा है।
सिक्का किस तरफ़ भी गिरे...चित पट्ट नहीं तीन मनके दिखेंगे मुस्कुराते हुए तुम्हारे नाम वाले
जानते हो...
शहर प्रेमियों से बनता है...
वादे शब्दों से बनते हैं।
चारों में से कोई नहीं बीतता
न शहर
न प्रेमी
न वादे
न शब्द
तुमको मैंने नहीं चुना... मन ढह गया होगा उस रोज़।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें