कल्पनाशब्दों के बीच
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कल रात भर से दिल्ली में झमझम है। सुबह 4 बजे नींद खुली तो लग…

कल रात भर से दिल्ली में झमझम है। सुबह 4 बजे नींद खुली तो लगा आज नीमराना जाना कैसे होगा। तैयार हो कर इंतज़ार किया कि थोड़ी थम जाए तो निकलते हैं। पर सारा सावन आज ही बरसने को तैयार था। ईश्वर का नाम लेकर वसंतकुंज से निकले कि जो होगा देखते हैं। बारिश के मज़े भी तो लेने थे।😊 महिपाल पुर आते आते लगा कि गलत आगये। सड़क पूरी पानी से भरी हुई । हमारे सामने की गाड़ी अचानक रुक गयी। उसके रुकते ही लगा अब फंस गए। पहिये डूब गए। गाड़ी दो पल आगे बढ़ी और बंद। बाहर तेज़ बारिश। किशन को पूछा अब? बेचारा भी क्या बोलता? दरवाजा खोलते तो सारा पानी गाड़ी में आ जाता। विनोद ने कहा निकलना तो पड़ेगा। बिना धक्के की कहाँ निकलती कार।😊😊😊 मैंने विनोद का लैपटॉप और सामान पीछे रखा। दक्षु को कहा तुम बस लैपटॉप का ध्यान रखना। हम दोनों बाहर निकले और घुटनों से ऊपर तक के पानी में डूब गए। गाड़ी तैर रही थी तो धक्का लगाने में दिक्कत न हुई। 7-8 मिनट धक्का लगा कर एक कम पानी की जगह तक ले आये। मुझे तो हँसी आ रही थी कि ले लो मज़े। बारिश में घूमने निकली कि डूबने कल्पना?😊 मैंने ईश्वर को याद किया कि काहे हैरान करते हो .....बड़ी मुश्किल से घूमने निकले हैं प्रभु! गाड़ी शुरू होने का नाम न ले। मैंने विनोद से कहा? Back to pavilion ।चले घर को? इतने में किशन बाबा का चक्कर चल गया।गाड़ी मान गयी। 😊😊 अब जयपुर highway पर दौड़ रही। adventure चालू है। ये भी मस्त रहा तजुर्बा👍 सब गीले हो कर बैठे हैं पर इत्मीनान है कि राखी दक्षु बुआ के घर मनाएगा। ये मुस्कान भी गीली है😊😊 Drenched बारिश रुकने का नाम न ले रही। हैडफ़ोन पर ग़ज़ल बज रही... मुहब्बत नासमझ होती है समझाना जरूरी है💐💐💐 संगीत और सुर के साथ सफ़र
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें