भाषा / Language
ज़िन्दगी का नुक़्ता एक तिल भी है और एक बड़ा पत्थर भी।
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ज़िन्दगी का नुक़्ता एक तिल भी है और एक बड़ा पत्थर भी।
मेरे रुखसार पर तिल फबता है ....
आज़ाद एक बड़ा शब्द है और उससे बनी आज़ादी एक बड़ी सोच ।
सोच इस लिए कि ये शब्द कुछ देर में आपसे निकल कर दूसरों को धर लेता है।
आज़ादी खुद एक बहुरंगी ,बहु आयामी, बहु तरंगित शब्द है।
इससे निकलने वाली रौशनी किसी के लिए प्रेरणा का सूरज हो सकता और किसी के लिए चुभता हुआ त्रिशूल भी।
व्यक्त होने करने की आज़ादी तो और भी जिम्मेदारी की है। आपका छंद किसी और के लिए बंध भी हो सकता है।आप चुभ सकते हो।फ़िज़ूल बेवजह भी हो सकते हो।
fb एक बेहद आसान और उतना ही कठिन पटल है। इससे प्रभावित हुए बिना रहा ही नहीं जा सकता। ये अपनी छाप गाहे बगाहे छोड़ता ही है हम पर। आभासी दोस्ती के नाम पर आप लोगों को एक yes भी देते हो कि ठीक है ..... परखो हमें।
मैंने fb को बस ज़ाहिर होने के लिए चुना।
जब से हूँ ....बस लिखा ।जो जी आये।
दोस्त जुड़े। दोस्ती मिली। दोस्त रहे।खो दिए। कुछ बस नाम भर के हैं। कुछ को खुद हटा दिया। कुछ ने मुझे हटा दिया।
कारण एक ही रहा.....मैं बहुत कम दूसरों की वाल पर जाती हूँ। कुछ 4 या 5 ही होंगे।
मुझ से हो नहीं पाता।मैं खुद की सारी पोस्ट भी लिख कर भूल जाती हूँ। लोगों को लगता है मैं socially active हूँ पर मैं जो हूँ वो बस मैं ही जानती हूँ। खुद में गुम।😊
अपना लिखा सँजोना भी छोड़ दिया।
लिख कर कहीं नहीं जाना। जहां जाना था पहुंच गई हूँ ।बहुत से भी बहुत कम दोस्त रखती हूं। किसी से चैट करने या ज्यादा फ़ोन पर बात करना भी अच्छा नहीं लगता। अकेले घंटों मुस्कुरा सकती हूँ।
कोई नहीं भी हो तब भी।
लिख कर झूम आती है। एक नई ताज़गी भी।मन का कूड़ा निकल जाता है।
प्रेम पर लिखती हूँ।अपनी तस्वीरों से खेलती हूँ। तुम और मैं में डूबी रहती हूँ।
कोई नाम दूँगी तो चेहरा बनाएंगे लोग ।कहानी लिखने का हुनर है नहीं मुझे। इसलिए मैं, तुम और हम इन तीन किरदारों को बुनती हूँ।सब इसे स्त्री पुरुष बना कर पढ़ते होंगे। पर ये बस प्रेम के कारोबार में मुझमें किरदार निभा रहे।
ये ऐसे ही रहेंगे। मुझे ये ऐसे ही पसंद हैं।
मुझे प्रेम लिखने के अलावा कुछ आता भी नहीं.....
यही है मेरे पास....यही रहेगा।
ये भी जानती हूँ कि लोग हँसते बातें बनाते हैं, जज करते हैं।पर कुछ मेरे साथ हो लेते हैं ।मेरी नादानियों में मुस्कुराते हैं।बस उनके लिए हूँ यहां।
अक्सर मेरी स्त्री मित्र मुझसे पूछती हैं...मैसेज करती हैं कि इतना बेबाक कैसे लिखती हो? तस्वीरों का इतना शौक? इतना खुलकर कैसे जीती हो?मिलती हैं तो कहती हैं fb पर छाई रहती हो। डर नहीं लगता?
बाद में मेरे हाथ दबा कर यह जरूर कहती हैं कि लिखा करो ।चाहे हम लाइक कमेंट न करें पर अच्छा लगता है कि कोई हमारी जैसी उड़ रही।बह रही।
मैं हँस देती हूँ। कहती हूँ अगले जन्म में अगर छिपकली बन गयी तो कैसे श्रृंगार करूँगी ...कैसे लिखूँगी मन ....
मरने से पहले सारी चाहनाएँ पूरी कर लेनी है मुझे। वैसे भी मेरे शौक बहुत कम हैं ।तृप्त हूँ।पर जो चाहिए मुझे वो तो चाहिए ही चाहिए। ईश्वर से मांग रही हूँ रोज़।
मेरी वाल पर पुरुष मित्र जितने भी हैं उनकी भी दिल से शुक्रगुज़ार हूँ कि मेरी सोच को मान देते हैं। मेरी वाल बेहद साफ फिज़ूल टिप्पणियों से मुक्त है।जो मुझे जान जाता है वो छोड़ कर चला जाता है। जो मुझे पहचान जाता है...वो बरसों से साथ हैं।
आप सब का तहे दिल से शुक्रिया।💐
ये मंच आसमान है मेरा.... जिस रोज़ तक मन होगा उडूंगी।।किसी रोज़ मन न हुआ तो उजाड़ भी दूँगी।
जिन्दगी बेहद खूबसूरत है। मैं इसे लिख कर दर्ज़ करती हूँ। कोई क्या कहेगा ?कौन पढ़ेगा? सही या गलत के डर से परे।
एक सादगी पसंद कल्पना ही मिलेगी आपको।जैसी हूँ वैसी ही।कोई छल नहीं।
रहोगे तो ठीक ....मिलती रहूँगी
जाना चाहें तो भी ठीक..... दो यात्री कभी भी बिछड़ सकते हैं।
मुझे मेरे जैसा ही accept कर लेने का शुक्रिया।💐💐 हम अपनी आज़ादी दूसरों के चेहरे की मुस्कान में भी देख सकते हैं।
ख़्याल रखिये💐💐 आज बहुत दिनों बाद शुक्रिया कहने का मन हो आया।
शुभरात💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें