कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 3018

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हम कई दफ़े प्रेम में पड़ जाते हैं

हम कई दफ़े प्रेम में पड़ जाते हैं..... सही प्रेम हम में एक बार ही पड़ता है। *एक रोज़ जिस दिन तुम मेरे लिखे को छुओगे तो जानोगे कि तुमको तुमसे ज्यादा जिया है मैंने । तुमसे ज्यादा शोर मैंने लिखा है । हर मायने में तुमने मुझे कम चाहा। जिस रोज़ मिलान करोगे हमारी प्रतीक्षा का .... पाओगे कि तुम बिंदु भर हो और मैं वृहद भर तुम गढ़ जाओगे अपराध बोध में कि तुमने मेरे कितने ही शब्दों में अपना कदम नहीं रखा ।कितने ही बार तुम्हारी परछाई छू भर कर निकल गयी मेरे शब्दों को। मेरे शब्द ख़ाली रह गए बिना तुम्हारे स्पर्श के। तुमको कई कई बार अधूरे वाक्यों में छोड़ दिया है उदासी में घिर कर। पर तुम छूटे नहीं। तुम मुझे मानी देते हो। क्या किया जा सकता है। सब लिखा मेरा तुम्हारे लिए उड़ा दिया है। प्रेमपत्र उड़ते हुए दिलकश लगते हैं मुझे। हवा में गुनगुनाते हुए। मगन
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें