कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2999

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पसंद और मोह के बीच एक महीन रेशा होता है

पसंद और मोह के बीच एक महीन रेशा होता है... इसी रेशे को बीनते रहना प्रेम है। वो.... अपनी तस्वीरों से इतना मोह? मैं.... क्या गलत है? बस वक़्त की चोटी पर उम्र के फूल बाँध देने की कोशिश है।मुझे मुस्कुराना अच्छा लगता है। वो.... मुस्कुराते हुए देखना भी तो मुस्कुराने जैसा ही है। मैं ....हाँ है तो ।क्या तुम मुझे देख कर एक पल को मुस्कुराते हो? वो....( हंसते हुए) बिल्कुल नहीं। इश्क़ में हो? मैं....कौन नहीं है। वो.....बढ़िया है। मैं....कौन?मैं या मेरी तस्वीर? वो.... तुम्हारी नादानियाँ *मैं बातें बनाती हूँ😊😊😊 बस तुम को कहानी बनाउंगी।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें