कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2996

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पहाड़ों को देखती हूँ ...तो देखती ही रह जाती हूँ।

पहाड़ों को देखती हूँ ...तो देखती ही रह जाती हूँ। कुछ नहीं बोलते पर लगता है अभी बाहों में भर लूँ।गले लग जाऊं। कहूँ कि तुम्हारा इंतज़ार है। जो पलट कर नहीं बोलते वो कितने प्यारे लोग होते हैं.....यार ये जो कुछ न कहने का जरिया है ना..... तुम्हारा बस वही हमारा है। बाक़ी सब बातें तो फ़िज़ूल पुल हैं.....वीरान तुम मुझे न कहते हुए भी बहुत अच्छे लगते हो।कितने दफ़े हैरान कीजियेगा? मरती हुई दुनिया तुमने ही बचा रखी है मेरी😊😊 बची रहेगी। शुभदिन💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें