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रचना 2995

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लुत्फ़ वो इश्क़ में पाए हैं कि जी जानता है

लुत्फ़ वो इश्क़ में पाए हैं कि जी जानता है रंज भी ऐसे उठाए हैं कि जी जानता है जो ज़माने के सितम है वो ज़माना माने तूने दिल इतने सताए हैं कि जी जानता है *कविता जी की आवाज़ में ये ग़ज़ल जानलेवा है।😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें