कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2991

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ये तेरे दो नैना

ये तेरे दो नैना.... करे हैं एक पल में हज़ारों बातें कल दिल एक उलझन में अटका तो अटका ही रह गया। दिन भर ऊन के गोले की तरह खुद को खोलती लपेटती रह गयी। मन शांत न हो तो जल्दी सो जाती हूँ एक नए दिन के इंतज़ार में । नींद में अचानक लगा कोई ताक रहा... नींद से आधी भरी आधी खुली अँखियों से देखा तो एक जोड़ा आँखें थी। *अरे तुम ....यहाँ कैसे ? मैंने पूछा *सो रही हो? उन्होंने पूछा *हाँ ...तो अभी रात तीन बजे शरीफ़ आँखें सोती ही हैं। *तो जाऊं? *अब इतनी दूर से आये हो तो कुछ देर रुक कर चले जाना...मैंने अपना आधा सिरहाना ख़ाली कर दिया। दूर से थकी आँखें चमक गयी।बिना कुछ कहे सिरहाने पर पसर गईं। करवट बदलकर मैं भी उनकी तरफ़ मुँह करके लेट गयी। तभी लगा कोई मेरे गाल में उँगली चुभो रहा.. कौन होगा ?....वही आँखें ही होंगी ...सोचकर मैं अपनीआँखें मूंदे लेटी रही। *सुनो... *आँखें ही बंद हैं कान खुले हैं. ... सुन रही ...बोलो...मैंने उन आँखों की थकान थोड़ी और बढ़ाते हुए कहा। * अच्छा .... देखो... *देखो न कल्पना.. अब मेरे पास क्या ही चारा था ...आँखें खोली तो बेहद करीब की झाँक महसूस हुई।पर मैं कुछ न बोली। * तुम्हें वो झाँक याद है? *कौन सी? वो भीड़ वाली? मैंने पूछा *हाँ.... कितनी दूर बैठी थी तुम। *जैसे तुम तो उठ कर मेरे पास ही आ जाते अगर कहती...मैंने मुँह बनाते हुए कहा। *उस दिन की झाँक की बातें याद है? *हाँ ...दो शब्द किसको याद नहीं रहते ? *एक बार फिर कहोगी क्या...?आज फिर मेरे लिए *बनोगे मेरे ?...मैंने झट कह दिया। *रहोगी मेरी? ..मेरे छूटते ही उन आँखों ने पूछा इसके बाद की चुप्पी ने पूरी झाँक को ढँक दिया ...जाने कितनी देर तक। इस बेइंतहा झाँक को कोई नाम दिया नहीं जा सकता। अचानक दो जोड़े नैना हँस पड़े। *सुनो ...तुम ये झाँक के चार शब्द सुनने- कहने के लिए इतने दूर आये। कैसे से हो? *न मैं तुम्हें देखने आया हूँ।ये झाँक तो मेरी हथेलियों में क़ैद है तुम्हारे जाने के बाद से। आँखें तो चूम नहीं सकती थी तो मेरे होठों ने उन्हें चूम लिया।उनको चूमने के बाद जो बची एक चुटकी हँसी थी ...इन होठों पर ठहर गयी और मेरी आँखें बंद हो गयी। सुबह 5 बजे अलार्म बजा तो पहले हाथ सिरहाने पर गया...फिर फ़ोन पर। चूल्हे पर चाय चढ़ाते हुए यही ख़्याल आया...इतनी दूर सी आयी थी आँखें ... सिर्फ़ तुम्हारे लिए। एक कप चाय तो तुम पूछ ही सकती थी कल्पना .…... *जिस रोज़ ये लिखा था उस रोज़ से आज तुम और ज्यादा प्यारे हो😊 याद कांटा है।चुभते रहना चाहिए।दर्द बना रहे तो ज़िंदा लगती हूँ। उम्मीद रहती है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें