कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2980

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Dear Bhavya Pandey

Dear Bhavya Pandey , सबका अपना एक संगीत होता है।तुम्हारा भी होगा। पर अक्सर हम अपनी लय दूसरे के साथ मिलाने सुनने में लग जाते हैं। अपने को पीछे धकेलते रहते हैं। खुद को समय ही नहीं देते। मैं हमेशा कहती हूँ कि कुछ पल अपने एकांत में जाकर अपने तार जरूर छूने चाहिए। जितना शोर मुझमें मेरा अपना है वही मेरा संगीत है। इस बात को समझना ही होगा तुम्हें। जब तक तुम खुद को प्यार नहीं करोगी कोई दूसरा तुम्हें वो जगह क्यूँ देगा। ज़िन्दगी एक सजा हुआ पटल है। ये हार ,बदगुमानी,दुःख, चाहनायें,जिजीविषा, अधैर्यता, और हर रोष मुझे सात सुर लगते हैं ... ये मेरे घुंघरू बजते रहते हैं। इनकी चुभन सिर्फ़ मेरी है... मैं जानती हूँ इनके साथ रहकर भी खूबसूरती से मुस्कुराना और जीना क्या है। कुछ भी स्थिर नहीं... बस इस शोर के सिवाय तुम भी अपने शोर को सुनना सीखो। लय में रहना बेहद शानदार हुनर है। जियो.... मैं बेहद सुरीली हूँ.... सिद्ध क्यूँ करूँ? ये कहना आना चाहिए तुम्हें। चाहती हूं तुम भी हर सुर को पहचान कर इसे पगबद्ध कर लो। तुम को उड़ने के लिए ही जन्मा है। लयबद्ध उड़ान कायम रहे। बस जड़ें न भूलना। Miss u...💐 माँ *तस्वीरें भव्या की हैं जिसे याद कर रही अभी😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें