भाषा / Language
सलीका
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सलीका.....
मैंने बेहद सलीकेदार दोस्त चुने....
Unique
एक चाहना का पीछा करते हुए।
जिसे चुना उसके बेहद पास पहुंची
उसे अपनी आंखों से देखा
परखा
कई बार
कई सालों तक
मैं उनकी याचना में रही
फिर एक रोज़ इसी परख ने कहा ....
इसे छोड़ दो।
मैं धीरे धीरे बेहद खूबसूरती से चुप हो गई।
मैंने उन में से कुछ को भरी दोपहर में अपने लिए अस्त कर दिया।
दोस्ती का दीपक उलट दिया
बिना कहे।
बिना उस तक पहुंचे।
मेरे पास एक सलाहियत हमेशा बची रहेगी।😊😊😊
मेरा दिन उग गया है ...
आपका शुभ रहे।💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें