भाषा / Language
आधी रात को उठकर सुबह के गाल नोचने का मन करता है।
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आधी रात को उठकर सुबह के गाल नोचने का मन करता है।
शाम ढ़लते ढलते चाँद चूमने का जी हो आता है।
मैं वक़्त को फुटबॉल की तरह ठोकर मारती रहती हूँ।
क्या मैं खुमार में हूँ?
थोड़ा इश्क़ और नवाज़ो इधर
अभी दरकार बाकी है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें