भाषा / Language
हिज़्र का मौसम नुमाया है
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हिज़्र का मौसम नुमाया है
न तू गया ही न तू आया है।
मलाल तो कोई लफ्ज़ नहीं
इश्क़ का ये चौथा पाया है
बाद तेरे ख़्याल की खुश्बू है
दुआ दर्द एक सा हो आया है
सोच रे बन्दे कुछ तो सोच रे
ये पैबंद तूने ही तो बनाया है
रंग की पानी से ही प्रीत है
तूने मैंने ये कर दिखाया है
दरख़्त छांव का घर नहीं
जिस्म रूह लिवा लाया है
मैं अपना खंजर ख़ुद चुनूँगी
देखूं..कौन मेरा कब पराया है
चुप्पियां ख़तों पर रसीद नहीं
ना आने का पूरा किराया है
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*सफ़र पर हूँ अभी ..... तुम हो, मैं हूँ और ये तुकबंदी है।
शुभदिन😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें