भाषा / Language
मेरे बहुत कम दोस्त हैं
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मेरे बहुत कम दोस्त हैं...
पर सब खड़ूस हैं।😊😊😊
फिर भी मुझे अपनी पसंद पर फ़ख्र है । दोस्ती मैंने चुनी।हाथ मैंने बढ़ाया। मुझे जिसतक पहुंचना होता है मैं राह बना लेती हूँ।
मैंने ना खत्म होने वाले रिश्ते जोड़े।
क्या है ना...मेरी रेत घड़ी पलटती नहीं।
मेरा प्रेम उन पर गिरता रहेगा।बिना रुके ।
तुम चाहे आओ न आओ
मुझसे बोलो न बोलो
मोहपाश खत्म न होगा।
मैं हर बार लौटूंगी।हर बार मैं ही आवाज़ दूँगी।
वादा मेरा खुद से है ।
इसमें वो दोस्त कहीं नहीं हैं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें