भाषा / Language
मैंने अमूमन रोज़ कहा
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मैंने अमूमन रोज़ कहा....
मैं तुमसे प्रेम करती हूँ
उसने अपनी हाँ कभी न दी....
ये सोच कर कि मैं उसे ऐसा कहना किसी रोज़ बंद न कर दूं।
उसकी ये बात जब तक समझ आयी तब तक मेरे पास उसकी ना का एक बड़ा रेगिस्तानी टीला बन चुका था ।
अब उसमें रोज़ एक हाँ खिली रहती है।
अब नहीं कहती ....मुझे तुमसे प्रेम है।😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें