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मैंने अपने प्रेम को हमेशा संभावना से ही भरा

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मैंने अपने प्रेम को हमेशा संभावना से ही भरा .... सीमाओं के पार जाकर देखने का औत्सुक्य मेरी उदात्त नज़र से देखोगे तो पाओगे कि मैं और तुम पारदर्शी होते हुए भी अर्थबहुल हैं। मेरे प्रेम की सुन्दरता को विलक्षण दृष्टि ने नहीं मेरी कल्पना ने रचा है।तुम यहां कहीं नहीं होकर भी मेरे लिए सिर्फ़ मेरी सबसे रहस्यमय कृति हो। *पहाड़ी धूप छांव.... गीत ,किताबें और मैं😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें