भाषा / Language
वक़्त....गुजरता नहीं
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वक़्त....गुजरता नहीं
*हम हादसे की कगार पर खड़े लोग हैं
वक़्त से वक़्त रहते सरकने की गुहार लगा रहे।
*ये कौन सा पत्थर हो गया है वक़्त जिसका भार सांसों से बढ़ रहा।
*साँस की भी दो सुइयाँ रह गयी हैं...
पल ...दो पल
वक़्त की तरह छूटते जा रहे जिगरी
यारियां रुक गईं हैं ..अरसा हुआ।
*हर घड़ी में बस एक समय बज रहा ....कोरोना
*ये पहली बार है कि वक़्त बज नहीं रहा....बजा रहा है
हर कोई बज रहा .. दुःख दुःख दुःख दुःख
उदासी तो है पर कल से कम है।एक रोज़ खत्म होगी .....जानती हूँ मैं💐
शुभरात💐💐💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें