भाषा / Language
तुम्हें इतना दे देने के बाद भी बची रह जाती हूँ
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*तुम्हें इतना दे देने के बाद भी बची रह जाती हूँ.....
तुम कब चुपचाप मुझमें मिल जाते हो?
*रोज़ तुम्हारी आवाज़ की तस्वीर बनाती हूँ....
मुद्दत हो गयी खुद को तुम में देखे सुने हुए
*एक रोज़ उसने मुझे कहा ....
उदास मत हुआ करो
कुछ और कर लो
मैं उसी पल भरभरा कर गिर गई।
मुझे क्या नया होना चाहिए ?
उसके लिए ....
*लिखना मेरे लिए मौन छूना है। कोई पास न हो और खूब सारी बातें हों ....तो लिख लेनी चाहिए। एकांत जमा नहीं होता....स्याही में बह जाता है।
आबाद रहिये
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कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें