कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2708

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तुम्हें इतना दे देने के बाद भी बची रह जाती हूँ

*तुम्हें इतना दे देने के बाद भी बची रह जाती हूँ..... तुम कब चुपचाप मुझमें मिल जाते हो? *रोज़ तुम्हारी आवाज़ की तस्वीर बनाती हूँ.... मुद्दत हो गयी खुद को तुम में देखे सुने हुए *एक रोज़ उसने मुझे कहा .... उदास मत हुआ करो कुछ और कर लो मैं उसी पल भरभरा कर गिर गई। मुझे क्या नया होना चाहिए ? उसके लिए .... *लिखना मेरे लिए मौन छूना है। कोई पास न हो और खूब सारी बातें हों ....तो लिख लेनी चाहिए। एकांत जमा नहीं होता....स्याही में बह जाता है। आबाद रहिये 💐💐💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें