भाषा / Language
ये गहरे अवसाद का समय आ रहा
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ये गहरे अवसाद का समय आ रहा...
खेल खेल में दुनिया फिसलती जा रही।
कोई नहीं जो सुन सके।
वैसे भी हम ऊँचा सुनने वाले लोग हैं।पहली चेतावनी हल्के में लेते हैं।
ईश्वर जानता है हमारी फितरत
अबकी लाठी ज़ोर से पड़ेगी।
तैयार हो जाओ
अपनों को संभालो
उम्मीद और प्रार्थना का ही सहारा है।
ईश्वर ने पहले द्वार बंद किये अबकी पीठ मोड़ चुका ।
बचो और बचाओ अपनों को।
*आज मन बेहद अशांत है । स्कूल में ,आसपास, रिश्तेदारों ,मित्रों को कोरोना की खबर ने आहत कर दिया है।
क्या सोचते हैं क्या हो जाता है।
हर दिन ख़ौफ़ में जीना हो गया।
😢😢😢😢
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें