कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2681

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हम अपनी सीमा के पार जाते ही तब हैं जब पीछे छूटने को और आगे…

हम अपनी सीमा के पार जाते ही तब हैं जब पीछे छूटने को और आगे लूटने को कुछ न बचा हो। हम खुद अपने पर काट कर तभी उड़ते हैं... उदासी .......सबसे बड़ी ज़िद्द है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें