भाषा / Language
उस किसी भी रोज़ जब खुद को बेशुमार देखने का मन होता है तुम्हा…
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उस किसी भी रोज़ जब खुद को बेशुमार देखने का मन होता है तुम्हारी डायरी पलटती रहती हूँ .... घंटों तक।
खुद को बहलाना क्या मुश्किल है?
जहाँ ना मिलने की उम्मीद हो उन्ही पन्नों पर घंटों तक दस्तक देना भी तो इबादत ही है।
बंद दरवाज़े के उस पार कोई नहीं और इस पार सिर्फ मैं ही मैं...
देखो .....हुई ना मैं बेशुमार ?
चाहनाएँ पूरी हो जाएं तो प्रेम मर जायेगा।
डायरी को इंतज़ार कराना ठीक नहीं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें