भाषा / Language
पार की औरतें
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40 पार की औरतें....
कुव्वत हो जाती हैं...
चावल में से कंकड़ नहीं ...मन तक फेंक देने वाली।
मन चोटी में बांध ने वाली
कभी पैर के बिछिये में...
ठोकर सा पहनने वाली भी
ज़िद्द में आए तो
एक टैटू सी ...
वजूद पर छपने वाली।
खूबसूरती से परे...
खून का लोहा जानने वाली
कमियों को हाँ कहने वाली
पसंद पर उँगली नहीं
पूरी हथेली धर देने वाली
खुलकर प्रेम करने वाली...
शख्स से ज्यादा शख्सियत से
नज़र से ज्यादा नज़रिए से
बंद मुट्ठी से ज्यादा छुट्टे पलों से
अपने बेटी को यह कह सकने वाली कि...
जी ले अपनी ज़िंदगी
कि वैसे भी मन एक कनस्तर है
खाली बजेगा
और भारी चुभेगा भी
चुन.... तू
दो मन ...जो बंध सके।
40 पार की औरतें चुनती नहीं रंग या रंगत
उम्र से बेख़ौफ़
इल्म से लबरेज़
खरीद लाती है रोज़ नए कैनवास
उदासी से भीगे
चाहनाओं में डूबे।
रचती है शब्दों से प्रेमी और कविता कह कर सरे आम नकार देती है।
तुम अगर किरकिरी बन लिए तो 40 और को पार लगा देने वाली
रेशमी....
पर खद्दर से बनी
भाषा और आशा से कहीं ऊपर
ये चालीस पार वाली औरतें😊
पचास में इससे भी ज्यादा हवा और पानी हो रहेंगी।
नई धूप रच लेगी ...और चटक
पीली नहीं ....सफ़ेद
तुम 40 गिन रहे
वो 50 बिन रही।
*किसी की वाल पर यह शीर्षक तो पसंद आया पर औरतों को लेकर भाव छू न सके।
मन ने फिर अपना मन लिखा । मेरी जैसी 40 साल से परे औरतें तो मुझे ऐसी दिखती और मिलती हैं। 😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें