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अक्सर सोचती हूँ...लिख कर क्या पाओगी

अक्सर सोचती हूँ...लिख कर क्या पाओगी ? फिर एक शाम Vikas Singh जैसे प्रेमिल इंसान मिल जाते हैं । आज की शाम तुम्हारे नाम रही। आप से fb से कई सालों से जुड़ी हूँ। वो कहते हैं मैं आपका फैन हूँ पाठक हूँ। मुझे ये बात हैरत में डाल देती है। आज भी जब वे मिले तो झुक कर यही कहा कब से आप से मिलने का मन था। मैं आपका पाठक हूँ । आप बहुत प्यारा लिखती हैं। इस क्षण को मैं अच्छे से जानती हूँ क्योंकि मैं खुद जब अपने पसंदीदा कलमकार से पहली बार मिली तो लगा साँस नहीं आरही। 😊😊 छू कर देखा तो विश्वास आता है। आप जिसको शब्दों से चाह कर शब्दों का ही पुल बनाकर मिलते हो लेखनी की दुनिया में वही fandom है। एक मन जीत लेना कई किताबों को बेचने से कहीं ज्यादा है। मैं खुशनसीब हूँ आप मेरे मन की डोर पकड़ कर मुझ तक पहुंचे। ये बात कितनी सुकूनमय है कि अभी भी दुनिया में आप जैसे सादे लोग हैं जो सहेजना जानते हैं। आप का किताबों से लगाव और आत्मसात करने की इच्छा दिखती है। आपको @कल्पना लाइव सौंप कर खुद बेहद खुश हूं। किताब को खरीद कर पढ़ने की मंशा और आपकी दी हुई पुस्तक राशि अभी मेरे मंदिर में रखी हुई है। ये बड़ा दिन है मेरे लिए। एक मित्र अगर आपके लिए किताब लाता है तो वो वाकई आपको प्यार करता है। आप की दी हुई प्यारी किताबें जरूर पढूंगी। आप का एक message मेरे doc में संजोया हुआ है जो मुझे मेरी लेखनी से नाराज़ नहीं होने देता। बल देती हैं वो पंक्तियां। आप जैसा मित्र पाठक और आपके शब्दों में फैन कह देती हूँ....सबको मिले। मैं बेहद सादी हूँ। लिखना मेरे लिए कहीं पहुंचना नहीं है। बस खुद में गोल गोल झूमना है। आप मेरी इस झूम का हिस्सा रहें ।मेरा मन आपके लिए हमेशा खुला मिलेगा। खूब आशीर्वाद। मुझ तक पहुँचने का बहुत बहुत शुक्रिया। दुआएं आपको।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें