भाषा / Language
आज के दिन का हासिल
✦
आज के दिन का हासिल...
मेरी बालकनी
अल्मोड़ा थी तो ये पौंधे मेरा स्पर्श भूल गए। जब से लौटी हूँ इन्हीं को जिलाने में लगी हूँ। अब जाकर मुस्कुराने लगे हैं थोड़ा थोड़ा। सुकून की एक हरी जगह । कई दिनों से कुछ अलग करने का मन था।शुरुआत इस बालकनी से की आज ।
कल दूसरी वाली को छूना है।😊😊
याद में डूबी शाम भेज रही हूँ...
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें