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रचना 2606

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दो ईश्वर एक साथ कैसे रखती

*दो ईश्वर एक साथ कैसे रखती... एक आँखों पर रहता है तो दूजा जुबां पर। जगहें बदलती हैं पर ईश्वर और तुम नहीं बदलते। *ये तस्वीरें तुम्हारी मेरे सुकून का रसीदी टिकट हैं...... मुझ तक मेरा आने का रास्ता बिना रेल बिना सड़क *ऐसी तस्वीर ऐसा हुस्न खुदा मुझको भी बक्शे... जो आँखों पर दिखता रहे जुबां पर छिपता रहे *दायरे वाली बात थी... एक बार तुमसे मिले फिर तुमसे ही मिलने की हूक उठी ...रही...और कायम रही। पहली तस्वीर आखरी बार खींच ली । *सब्र की ही बात है.... रोज़ यही कहकर एक तस्वीर छेड़ती है मुझे मैं भी फ़क़त जुमला कहकर चूम लेती हूँ उसे। * ये तस्वीर पसंद आ गयी fb पर तो झूम में कुछ कुछ लिख दिया अभी अभी😊 तुम्हारी तस्वीर पर लिखना अच्छा है ... कहो नहीं पर मुस्कुरा तो दो 😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें