कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2603

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कई दिनों से एक ही जगह पर तैर रही हूँ..... जी रहीं हूँ।

कई दिनों से एक ही जगह पर तैर रही हूँ..... जी रहीं हूँ। तुम इस लिए भी मुझे पसंद हो कि किस्सों को कहानियों से लंबा कर देने का हुनर रखते हो । एक रात में कई दिन और न जाने कितनी शामें हर कोई थोड़े ही रख सकता है । और वो मूक प्रेम हर किसी से ....अहा अक्सर सोचती हूँ तुम लिखते अच्छा हो या हर किसी के हिस्से तक पहुंचते अच्छा हो ? हैरत तो इस बात की है कि तुम निष्प्राण में भी सांस फूंक कर प्रेम लिखते हो । आसपास कितना जीवन रच लेते होंगे न तुम। सुनो ! शब्दों से मुझे भी दो चार सांसें फालतू दे देने का शुक्रिया। दुआएँ....
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें