कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2599

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मन के भीतर अपनी अलग मिट्टी अलग मौसम होते हैं ।

मन के भीतर अपनी अलग मिट्टी अलग मौसम होते हैं । तुम्हारा वाला प्योंली का फूल यहां बारहमासी खिला रहता है। तुम हँसते हो तो ये रंग बदलता है। मन का फूल है... सिर्फ़ तुमको चढ़ता है। *गमलेबानी करते हुए आया ख़्याल
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें