भाषा / Language
रोज़ आईने के पास जाकर कहती हूँ
✦
रोज़ आईने के पास जाकर कहती हूँ....
प्रेम को आज एक मौका और दूँगी।
आईना कम नहीं होता...
प्रेम दिखता रहता है।
देना माँगना नहीं होता😊😊😊😊
होना होता है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें