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होता है एक चेहरा ऐसा .....एक वजूद ऐसा जिससे चाह कर भी नाराज़…

होता है एक चेहरा ऐसा .....एक वजूद ऐसा जिससे चाह कर भी नाराज़ नहीं रहा जा सकता । न चाहते हुए भी वह हमारे दिल का खाद पानी सोखते रहता है। हममें पलते रहता है। रुका रहता है। द्वार बंद कर दे तो दरार से झांकने का मन हो जाता है उसे ।अबोला लाख पसर जाए पर आंखें उसे ढूंढ़ना कभी बंद नहीं करती । उसकी आवाज़ आती रहती है। लाख राहें मिटा दो ...नक्शे छिपा दो,दिशाएँ गुम कर दो ,तस्वीर धुन्दला दो.. तुम को बार बार क्यों खोजती हैं ये उंगलियां ? चले क्यों नहीं जाते तुम?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें