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दरवाज़ा खिड़की सा बनना चाहता था

दरवाज़ा खिड़की सा बनना चाहता था .... खिड़की को हमेशा दरवाज़े ने हैरान रखा दोनों एक तय दूरी को कभी नाप नहीं पाए। बस आसक्त रहे । कभी घर को छोड़ कर नहीं गए। घर प्रेमिल रहा।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें