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एक चार दिवारी जो महकती भी उतनी ही है जितनी दुखती है

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एक चार दिवारी जो महकती भी उतनी ही है जितनी दुखती है..... मैंने तो प्रेम लिखा ... तुमने मन क्यूं पढ़ा? 😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें