कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 2497

भाषा / Language

एक चार दिवारी जो महकती भी उतनी ही है जितनी दुखती है

एक चार दिवारी जो महकती भी उतनी ही है जितनी दुखती है..... मैंने तो प्रेम लिखा ... तुमने मन क्यूं पढ़ा? 😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें