भाषा / Language
जानते हो...तुम्हारे लिखे में मुझे रूहें दिखती हैं।
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जानते हो...तुम्हारे लिखे में मुझे रूहें दिखती हैं।
अच्छा!
रोज़ तुम्हारा लिखा चूमती हूँ ....वे आज़ाद हो जाती हैं।
तो कोई मुझे प्यार न करे ?कोई मुझे न चाहे ?
आज़ाद इसी लिए तो करती हूँ कि वे लौटे पर तुममें बसे नहीं।
मेरी इबादत में खुशबुएँ हैं ....
तुम नहों समझोगे।😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें