कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2490

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जानते हो...तुम्हारे लिखे में मुझे रूहें दिखती हैं।

जानते हो...तुम्हारे लिखे में मुझे रूहें दिखती हैं। अच्छा! रोज़ तुम्हारा लिखा चूमती हूँ ....वे आज़ाद हो जाती हैं। तो कोई मुझे प्यार न करे ?कोई मुझे न चाहे ? आज़ाद इसी लिए तो करती हूँ कि वे लौटे पर तुममें बसे नहीं। मेरी इबादत में खुशबुएँ हैं .... तुम नहों समझोगे।😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें