कल्पनाशब्दों के बीच
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हर अगले दिन बीते कल को झाड़ कर एक बार फ़िर देखती हूँ कि मैं त…

हर अगले दिन बीते कल को झाड़ कर एक बार फ़िर देखती हूँ कि मैं तो भूल गयी ....तू अब भी कितना बचा है? नए दिन की उसी बचे बीते कल से नज़र उतार देती हूँ। दिन खुशनुमा बना रहता है। मेरी भी हँसी बची रहती है। *तस्वीर दक्षु को irritate करते हुए है उसी ने ली है😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें