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एक प्रेम फिर क़ैद किया

एक प्रेम फिर क़ैद किया .... आज़ाद कर दिया । एक नज़्म फिर ओढ़ी .... तह कर दी। एक मिसरा एक कौर चखा .... अधूरा रख लिया। एक मुस्कान क़तरा भर तोड़ी.... हथेली भर दी। बस ढेरों कहानियां बिखेर दी......
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें