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ईश्वर गढ़ के भूल गया स्त्री पुरुष को
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ईश्वर गढ़ के भूल गया स्त्री पुरुष को....
स्त्री ने सिर्फ़ याद रखा ईश्
दुख से कई ज्यादा सुख जैसे दुख में
पुरुष रचता रहा नई नई स्त्री
ईश्वर बन कर
स्त्री ने ईश् को कभी रूठने न दिया
वो अडोल रही।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें