भाषा / Language
फूल और पत्थर के बीच मैंने तुमको चुना
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*फूल और पत्थर के बीच मैंने तुमको चुना....
तुम न पिघले ....न बदले
* दुःख पत्थर से बनते हैं इसलिए कड़े हैं।
मैं एक साँझा अक्षर वाला पत्थर ढो लूंगी।
* प्रेमी ईश्वर ने दीवार पत्थर की और दर काठ का बनाया...
आना जाना सहूलियत भरा नहीं सलाहियत भरा होना चाहिए।
* हम पत्थर को छुए बिना नहीं बदल सकते .....
मेरे पास एक पारस है ...वो छूता है पर मुझे बदलने नहीं देता।
*मेरे पहाड़ों में पत्थर पर रंग लग जाए तो लोग पूजने लगते हैं...
तो मैं कहाँ गलत हूँ... कि कब से तुम्हारे रंग में रंग गयी हूँ?
*ईश्वर जिससे बना है वही तो देगा....
मुझे तुम मिले...
पहाड़
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें