भाषा / Language
मैं तुम में खिलती हूँ
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मैं तुम में खिलती हूँ
मुरझा भी तुम में ही जाती हूँ
मैंने तुम में खुद को हमेशा क्लिष्ट देखा है
निर्मल नीर सा
सुनहरी रेत सा
मैं आबाद हूँ तुम में
तुमने हमेशा ही सांस फूंकी है मुझमें
कोई नहीं बस तुम
कोई आसपास नहीं सिवा तुम्हारे
ये स्वीकृति है
मेरी अधीनता भी
मेरी अधीरता भी
एक प्रार्थना भी
तुम जीत चुके हो मुझे
मैंने विश्वास देख लिया है।
जीवन रेखा का चेहरा कहां होता है ?
अनुभूति होती है।
तुम हो।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें