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सुकून की मियाद तय नहीं होती

सुकून की मियाद तय नहीं होती... इश्क़ में तादाद तय नहीं होती। उसका मिलना मेरा खिलना होता है। खिल गयी सुबह। पल जकड़ने से ज्यादा पल उड़ा देने में सुख है। तुम उड़ कर मेरे पास ही आओगे । आओगे ना ? ज़ेहन में कैद हो .... दिल से आज़ाद रखा है। *तस्वीर कल दोपहर इस चिड़िया को बिन बताए खींची है। कोयल है शायद।इसकी पूँछ चमकीली नीले रंग का आभास दे रही थी। कैमरा अक्सर रंगों को कैद नहीं कर पाता ।आँखें याद कर लेती हैं।😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें