कल्पनाशब्दों के बीच
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जानते हो मेरे पहाड़ों पर चांदनी चीड़ों पर छन छन कर गिरती है औ…

जानते हो मेरे पहाड़ों पर चांदनी चीड़ों पर छन छन कर गिरती है और धूप उन पर टप टप टपकती है ..... वो बस मुस्कुराते रहते हैं ठीक उसी तरह एक रोज़ तुम मेरे लिए चीड़ हो जाना ... मुझे चाँद से धूप और धूप से चाँद लिखना है तुम पर । मुझे तुम पर पहाड़ी मुस्कान देखनी है... एक रोज़
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें