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पीले पत्तों की गुफ़्तगू

पीले पत्तों की गुफ़्तगू... हम दोनों एक ही बेल पर लदे थे तुम मुझसे पहले उगे, पहले बढ़े तो तुम्हारा पीला हो जाना तो बनता था.... मैं क्यों पीली पड़ गई ? मैं तो अभी ढंग से बढ़ी भी नहीं ? छोटी पत्ती ने बड़े पत्ते से मुँह फुला कर कहा। तुमने सूरज पहले गटक लिया और जल्दी जल्दी सारे पन्ने पलटे ।टाप- टाप कर पड़ाव पा लिए।बस इस लिए तुम जल्दी पीली पड़ गयी । बड़े पत्ते ने प्यार से समझाया। पर तुम में अब तक एक हिस्से में हरापन कैसे संभला पड़ा है? ये क्या जादू है भला? छोटी पत्ती फिर बोल पड़ी? ये मेरे वो अल्पविराम हैं ,जो हर पन्ने में छूट गए।हर पड़ाव पर मुझ से कुछ चाहनाएँ रूठ गईं।मैं सूरज तो गटक गया हूँ पर मुट्ठी भर चांदनी की फाँक मारनी बाकी है। बस इस लिए अपना कुछ हरापन खुद में रोके रखा है। बड़े पत्ते ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा। छोटी पत्ती खुद का पीलापन खुरच खुरच कर हटाने लगी ...ये सोच कर कि एक नई चाहना लिखने भर की जगह बना सके। पीले पर हरा उगा सके।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें