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रचना 2227

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मैं उन्हें क्यूँ छोड़ कर चली गयी

मैं उन्हें क्यूँ छोड़ कर चली गयी .... आज उन्हें दूर गए हुए 3 साल हो गए। उनकी किसी भी तस्वीर में वो हमसे दूर गयी हुई नहीं लगती। मैंने हमेशा उन्हें एक कर्मठ स्त्री के रूप में देखा और आज भी उन्हें ऐसे ही याद करती हूँ। चीजों की संभाल और पैसों को किस तरह आने वाले समय के लिए बचाया जाना चाहिए ये दोनों विशेषताएं उनसे सीखने लायक थी। जो कुछ है मेरे पास उन्हीं का दिया हुआ है। जीवन जीने का जज़्बा क्या होता है ये मैंने उनके साथ तब महसूस किया जब पहली बार उन्होंने 2009 में कैंसर c स्टेज से लड़कर हम सब को चकित कर दिया। chemo ,सर्जरी सब हिम्मत से झेल गईं। उनकी मितव्ययता आज भी याद आती है। वो दवाई खाने से मना करती थीं तो मैं कहती mummy 2000 की दवाई खाने से अगर 20000 की पेंशन आती है तो बुरा क्या है। वो हँस कर कहती....कह तो तू ठीक रही। हम दोनों ने कभी सास बहु कभी माँ बेटी दोनों का मजा लिया है। खुद working woman होने की वजह से उन्होंने हमेशा मेरे काम को भी मान दिया। उनके रहते तक मेरा घर हमेशा सुव्यवस्थित रहता था। बच्चे दादा दादी के साथ कैसे बड़े हो गए पता ही नहीं चला। सबसे बड़ा सुकून तो ये था की स्कूल से लौटो तो घर में ताला नहीं मिलता था। घर खुला स्वागत करता था। मुझे याद है 2017 में उनकी तबियत फिर बिगड़ने लगी। इसबार भी उन्होंने खूब हिम्मत रखी पर उम्र और बीमारी की वजह से धीरे धीरे शिथिल होने लगी। आखरी 5-6 महीने bedridden हो गईं। चिड़चिड़ापन बढ़ने लगा ,स्मृति खोने लगी। स्वास्थ्य हाथ छोड़ने लगा। 2017 ,2 अक्टूबर घर पर सारे रिश्तेदार आए हुए थे । इस बीच मेरे पिताजी का हल्द्वानी में हाथ फ्रैक्चर हो गया तो मैं उनसे मिलने सुबह की ट्रैन से घर चली गयी कि अगले दिन वापस आ जाउंगी। सब घर पर थे तो सोचा मम्मी को देख लेंगे सभी। बहुत असमंजस में गयी थी मैं.... रास्ते भर विनोद से पूछती रही...सब ठीक है? वापस आ जाऊं क्या? उस दिन पता नहीं मम्मीजी को क्या हुआ वो बहुत ही नम होती चली गयी। रोज़ ठीक हो जाती थी। उस रोज़ कुछ खाया भी नहीं।मैं 12 बजे हल्द्वानी पहुंची.... और इसी बीच मम्मी 4 बजे करीब शांत हो गए। मैं उसी वक़्त टैक्सी से डैडी के आपरेशन वाले हाथ के साथ घर लौटी ।रात 2 बजे घर पहुंची...पर मम्मी जी नहीं थे। ये मेरी ज़िन्दगी की एक बहुत बड़ी टीस है। 24 घंटे मैं उनके साथ रहती थी...एक दिन के लिए गयी ...वो मुझसे नाराज़ हो कर दूर हो गईं। कई बार माफ़ी मांगी पर वो लौट कर नहीं आई। पर मुझे पता है इनका आशीर्वाद हमेशा मुझ पर रहता है। वो तस्वीरों की तरह आज भी कहीं मुस्कुरा ही रही हैं।अपने बच्चों पर उनका साया हमेशा रहे।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें