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रचना 2226

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तुम ज़िन्दगी को हथेलियों में लपेट कर तोड़ देते हो

तुम ज़िन्दगी को हथेलियों में लपेट कर तोड़ देते हो ... मैं दाँत से काटकर अलग करती हूँ... बस यहीं औरत हो जाती हूँ तुमसे बहुत अलग😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें